सतना की 11.57 एकड़ जमीन का मामला, पूर्व मुख्यमंत्री के वारिसों की याचिका खारिज
पूर्व मुख्यमंत्री के उत्तराधिकारियों ने लगाईं थी याचिका
हाईकोर्ट में यह याचिका अंबिकापुर (छग) में रह रहे नर्मदेश्वर प्रताप सिंह, रामेश्वर प्रताप सिंह और सतना में रह रही माधवी सिंह ने दाखिल की थी। उनका दावा था कि उनके पिता शिव बहादुर सिंह ने वर्ष 1992 में अपने पिता गोविन्द नारायण सिंह से अनरजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए 11.57 एकड़ भूमि खरीदी थी और वे (याचिकाकर्ता) वर्षों से भूमि के कब्जे में हैं। इसी आधार पर उन्होंने स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की। ट्रायल कोर्ट ने प्रथम दृष्टया (prima facie) मामला मानते हुए 5 फ़रवरी 2025 को उनके पक्ष में अस्थायी निषेधाज्ञा दे दी थी।
असली मालिक के वारिसों ने दी चुनौती
विवादित जमीन के असली मालिक सेठ मनोहर लाल थे। मनोहर लाल की कथित पावर ऑफ़ अटॉर्नी के आधार पर पूर्व मुख्यमंत्री गोविन्द नारायण सिंह ने 11.57 एकड़ जमीन अपने बेटे शिव बहादुर सिंह को 8 दिसंबर 1992 को बेची थी। वर्ष 1998 में जमीन का नामांतरण भी हुआ। ट्रायल कोर्ट द्वारा 5 फ़रवरी 2025 को पूर्व मुख्यमंत्री के वारिसों को दी गई अस्थाई निषेधाज्ञा के खिलाफ सेठ मनोहर लाल के वारिसों ने जिला अदालत में अपील दाखिल की। जिला जज की अदालत ने 13 अक्टूबर 2025 को ट्रायल कोर्ट का आदेश निरस्त करके अस्थाई निषेधज्ञा हटा दी थी। इस पर यह मामले पूर्व मुख्यमंत्री गोविन्द नारायण सिंह के वारिसों (नर्मदेश्वर प्रताप सिंह, रामेश्वर प्रताप सिंह और माधवी सिंह) ने यह मामला हाईकोर्ट में दाखिल किया था।
अपील में खुली दस्तावेज़ों की पोल
गोविन्द सिंह के वारिसों की याचिका पर अपना फैसला सुनाते हुए जस्टिस जैन ने कहा- पूर्व मुख्यमंत्री गोविन्द नारायण सिंह और उनके बेटे शिव प्रताप सिंह के बीच हुई सेल डीड अनरजिस्टर्ड थी। बिक्री अनरजिस्टर्ड पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर की गई। सेठ मनोहर लाल की कथित पावर ऑफ अटॉर्नी में सतना की जमीन का स्पष्ट विवरण ही नहीं था। स्टाम्प भी अत्यंत कम मूल्य का था। इतना ही नहीं, जमीन सतना में थी, जबकि पावर ऑफ़ अटॉर्नी नई दिल्ली में बनाई गई।
मामला शुरू से ही कमजोर नींव पर
हाईकोर्ट ने कहा- इस तरह के दस्तावेज़ों पर प्रथम दृष्टया केस नहीं बनता। जब जमीन का स्वामित्व ही संदेहास्पद हो, तो निषेधज्ञा का कोई आधार नहीं होता। मामला शुरू से ही कमज़ोर नींव पर खड़ा है। यदि पावर ऑफ अटॉर्नी से अचल संपत्ति बेचने का अधिकार दिया जाता है, तो उसमें संपत्ति का स्पष्ट और विशिष्ट विवरण अनिवार्य होता है, जो इस मामले में नहीं था।
याचिका खारिज, लेकिन ट्रायल खुला
अंततः हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए साफ किया कि “यह निष्कर्ष केवल अस्थायी निषेधाज्ञा के संदर्भ में हैं। ट्रायल कोर्ट में अंतिम सुनवाई के समय पक्षकार अपने-अपने साक्ष्य प्रस्तुत कर सकेंगे।
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